मृत्यु के पदचिन्ह (कविता)

मृत्यु के पदचिन्ह (कविता) कैसी निर्वरता छाई है ? ना कोई आहटें , ना किसी की परछाई है. कल ही तो यह स्थान था, जन सैलाब से भरा हुआ, प्रकृति से हरा -भरा , विभिन्न लोगों से बसा हुआ. आज है हर तरफ सन्नाटा, हर आँगन प्रतीत होता है यूँ श्मशान सा, अपनी बदनसीबी को रोता ,अधुरा सा. आँगन तो है अब भी , मगर बच्चे नहीं, वृक्षों पर घोंसले तो है , मगर उनमें पंछी नहीं, वृक्ष भी कहाँ रह गए! , जले हुए ठूंठ है यह तो. पत्ते और टहनियों ने , कब का साथ छोड़ दिया तो! तो !! कहाँ खो गए ये सब?, किसने किया यह सर्वनाश ? कौन है अपराधी ? ह्रदय में उठे तमाम सवालात , और चुभ गए असंख्य कांटे . जब मैने देखी कुछ काली ,भयावह परछाईयाँ . यकीनन यह मृत्यु के पदचिन्ह इन्हीं के थे.

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8 Comments

  1. Vivek Singh Vivek Singh 20/07/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 20/07/2017
  3. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 20/07/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma Bindeshwar Prasad sharma 20/07/2017
  5. C.M. Sharma babucm 21/07/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 21/07/2017
  7. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/07/2017
  8. arun kumar jha arun kumar jha 21/07/2017

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