Mrat Kaaya Ka Rodan (मृत काया का रोदन) POEM NO. 230 (Chandan Rathore)

Mrat Kaaya Ka Rodan (मृत काया का रोदन) POEM NO. 230 (Chandan Rathore)

Mrat Kaaya Ka Rodan (मृत काया का रोदन) POEM NO. 230 (Chandan Rathore)

POEM NO . 230————मृत काया का रोदन————मृत काया के लिए हुआ आज फिर करुणा मय रोदन |छोटे छोटे बच्चों की आशाओं का हुआ शोषण ||रूठ गए जग छोड़ गए वो, अब कुछ ना रहा कृन्दन |लोग करे समाज करे, बस बेमेल बिन वजह चिंतन ||उठा कर काया बच्चों ने उनको खूब सत्कार दिया |अर्थ ना जाने वो बालक, जिन्होंने अंतिम संस्कार किया ||धर्म कर्म सिखलाने वाले ऐसे क्यों तूने जीवन त्याग दिया |हसीं ख़ुशी लाने वाले ये बिछडन क्यों हमारे नाम किया ||तुम आते तो हम खाते तुम खिलाते तो हम खाते |अब तुम्हारे बिन ओ !! पिता श्री कैसे कटेगी ये रातें ||मृत काया का दर्श ना होता, जीवन का कोई अर्थ ना होता |जीवन भर जिसके लिए जिए थे , वो ही जला देता है चिता ||आपका शुभचिंतकलेखक – राठौड़ साब “वैराग्य” (Facebook,Poem Ocean,Google+,Twitter,Udaipur Talents, Jagran Junction , You tube , Sound Cloud ,hindi sahitya,Poem Network)04:28pm, Sun 22-06-2014(#Rathoreorg20)_▂▃▅▇█▓▒░ Don’t Cry Feel More . . It’s Only RATHORE . . . ░▒▓█▇▅▃▂

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2 Comments

  1. C.M. Sharma 31/10/2017
  2. डी. के. निवातिया 31/10/2017

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