ज़िन्दगी

ज़िन्दगी, ज़िन्दगी की हो गई।

पर हमें रूसबा और बेख़बर कर गई।

ज़िन्दगी की तलाश में घूमा यूँहीं।

फ़िक्र मेरी और हद से बढ़ गई।

सिलसिला चलता रहा राहों में यूँहीं।

खुले आम उनकी आबरू ख़ाक हो गई।

और बाक़ी बची नीलाम हो गई।

बिक रही अब तो आबरू बाज़ारों में।

ज़िस्म की क़ीमत लगती अब हज़ारों में।

पर क्या करे सहमती दिल ही दिल में?

और धीरे-धीरे सुपुर्दे ख़ाक हो गई।

राज़ दफ़ने हुए कई से इन कब्रों में।

कब्र भी महरूम और बेख़बर ही रहीं।

कब्रों के मुर्दे भी गवाही देने आते हैं।

उन्हें भी निकलबा लेते हैं अपनी बातों से।

वे सोचतीं अब भी पीछा नहीं छोड़ते हैं ज़ालिम।

अब हमें भी नफ़रत हुई ऐसे इन्सानों से।

फूटते रहे बादल आसमानों अक़्सर यूँहीं।

मची खल-बली,अंदर-बाहर,कब्रों और श्मशानों में।

क्या फूटा है कभी गुब्बारा राख़ का?

इन्सान कहेंगे ना, पर शव कहेंगे यह चर्चा आम हो गई।

कभी उफ़ना था दरिया ज़िन्दगी और पाने का।

पर इस ज़माने को देख अश्कों में बह गई।

फ़रिश्ता भी देखकर हैरान है अब तो।

फ़रमाते रहे क़िस्मत अब आपकी रह गई।

ज़लज़ले अब तो आते हैं ख्यालातों अक़्सर।

हालात और भी बद् से बद्तर होती गई।

जवाब दे दो हे! मनुजों ज़मानें वालों।

क्या तुम्हारी इंसानियत पूरी तरह मर गई?

-सर्वेश कुमार मारुत

14 Comments

  1. Madhu tiwari 14/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
  2. arun kumar jha 14/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
  3. डी. के. निवातिया 15/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
  4. babucm 15/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
  5. chandramohan kisku 15/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 15/07/2017
  6. Bindeshwar Prasad sharma 15/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 16/07/2017

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