पेड़ तुम ठिगने हो गए हो

पेड़ तुम ठिगने हो गए,इमारतें लंबी हो गईंतेरी टहनियों की पत्तियां देखोमुरझा कर झरती जा रही हैं।पेड़ कब से तुम खड़े हो,घाम बरसात,सरदी की रात हो चाहेतुम तने ही रहेदेखते ही देखतेनभ तक तनी इमारतें हो गईं हैं।कब कहा तुमने कि देखो मैं ठिगना हो गया हूंडाल मेरे पात मेरेसूखते अब जा रहे हैं,सड़क किनारे मैं खड़ा,खड़ा जहां वही कटा अब जा रहा हूं,काट कर मुझी को राह बनते जा रहा हैं।मॉल्स हों या कि सड़केंमुझी को काटती बढ़ रही हैंछावं मेरे मुझी को डांटेंक्यांकर मौन मैं यूं खड़ा हूं।जंगलों को काट डाले,अब मेरी ओर निगाहें बढ़ रही हैं,मैं बौना हो रहा हूं,मेरे ही सामने ये मकान जन्मते जा रहे हैं।मैं ही हूं पीछे छूटता जा रहा हूं,पेड़ हूं शायद पेड़ ही रहा अब तलक,कहां जा सकता हूं,कहीं की यात्रा नहीं किया करता,लोग चले जाते हैं,मैं खड़ा ही रहा,जो अब कटता जा रहा हूं।

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5 Comments

  1. डी. के. निवातिया 13/07/2017
  2. chandramohan kisku 13/07/2017
  3. arun kumar jha 13/07/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 13/07/2017
  5. babucm 14/07/2017

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