ढलता रहता हूँ — डी के निवातिया

ढलता रहता हूँ

***

हर रोज़, दिन सा, ढलता रहता हूँ !बनके दिया सा, जलता रहता हूँ !!

कोई चिंगारी कहे, कोई चिराग !  यूँ नजरो में, बदलता रहता हूँ !!

सब के सब बन बैठे है सारथि मेरे !इशारो पे पग बांधे चलता रहता हूँ !!

सूरज था, झंझटी बादलो में घिर गया कभी छुपता, कभी निकलता रहता हूँ  !!

किनारे आँखों छाँव लेकर बैठा “धर्म” !खुद अपनी तपिश में जलता रहता हूँ !!

!!!डी के निवातिया

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

16 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 11/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  2. arun kumar jha 11/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  3. chandramohan kisku 11/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  4. Madhu tiwari 11/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  5. Saviakna 11/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  6. babucm 12/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017
  7. Bindeshwar Prasad sharma 12/07/2017
    • डी. के. निवातिया 18/07/2017

Leave a Reply