आरज़ू………..

मैं अपने मन की आरज़ू पर ही लिखता हूँ
अपने व दूसरों के सुखों – दुखों को
मात्र एक माला में पिरोता  हूँ
तुम क्या जानो यारों
इस जद्दोज़हद में
मैं क्या पाता क्या खोता  हूँ
अपने ही सुख पर हंसता
अपने ही दुखों पर रोता  हूँ
मैं अपने मन की आरज़ू पर ही लिखता  हूँ………

जिसपर बीती वो ही जाने
दूजा न कोई उसका दुख पहचाने
किस तरह लोग मिलते हैं – बिछड़ते हैं
अपने बन जाते हैं अनजाने
जिस पर बीती वो ही जाने……
तुम क्या जानो यारो दर्द क्या होता है
डूबती सांसो, मिटते जीवन का आभास क्या होता है
तुम क्या जानो यारो………..

मुझ पर क्या बीती इसका तुम्हें आभास नहीं
हर रात के बाद सवेरा होता है
पर हर सवेरे के बाद सुरमई शाम नहीं
मधुकर से पूछो कभी
कि मधुवन में वह क्यों भटकता धैर्य न खोता है
एक नेत्रहीन से पूछो
वह कब जागता कब सोता है
उसके लिए तो शायद
दिन भी रात्रि समान होता है
नदियों से पूछो कभी
वह कब ठहरती कब चलती हैं
वह तो बस जोगन की भांति
सबको अमृत प्रदान करती चलती रहती है
तुम क्या जानो…………….

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10 Comments

  1. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 11/07/2017
  2. C.M. Sharma babucm 11/07/2017
    • Yugal Pathak Yugal Pathak 14/07/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 11/07/2017
  4. arun kumar jha arun kumar jha 11/07/2017
    • Yugal Pathak Yugal Pathak 14/07/2017
  5. chandramohan kisku chandramohan kisku 11/07/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 11/07/2017

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