मगर, वह है कि नहीं आती (भाग-4)

मगर, वह है कि नहीं आती (भाग-4)03.07.2017: के कुछ और दास्तान:(1).मैंने देखा, विदाई के दौरान पहली बार मेरे ही सामनेएक बुलबुल ने निगल लिया अनार के तीन-चार दानेलगता है याद दिलाना चाहता था मुझको इसके माने।तुरंत याद आ गया, वह शगुन जो हमारे यहाँ मनाया जाता हैदही या मीठा विदा होने वाले, को अक्सर खिलाया जाता है।तब हुआ जुदाई का एहसासदिल में एक दर्द उभर आयाअचानक लगा दिल भर आया।******************************************(2).जिस तरह, पहले, बच्चे घोंसले में बैठा करते थे सटकरएक का मुंह उत्तर, दूसरे का दक्षिण हुआ करता था अक्सर।ठीक उसी अंदाज़ में दोनों टहनी पर आज बैठे थेमैं समझता हूँ यह आखिरी बार है, जो ऐसे बैठे थे।यह उनके बीच की मोहब्बत का अद्भुत नज़ारा था।उनके बैठे रहने का यह अंदाज़ कितना प्यारा था!जब बच्चे अमरूद की शाख़ पर बैठे थे, धूप निकली थीकुछ ही अरसे के बाद, काफी तेज बारिश होने लगी थी।मैंने स्नान करने के बाद देखा-उसी जगह बैठे-बैठे पहला भी भीग रहा था, दूसरा भी भीग रहा था।मैंने डाल को झुकाया, छाता तान दिया था, अब सिर्फ मैं भीग रहा था।छाते को टहनियों के बीच फंसा कर, मैं अंदर कमरे में जब आया हुआ था।पानी की बूँदें कम हुईं, बुलबुल उड़ाकर उन्हें, दूसरी जगह बिठाया हुआ था।04.07.2017: सुबह05:25 AM: हल्की बूंदा-बांदीएक बच्चा, अमरूद की टहनी पर दिखाबड़ा बुलबुल चारा दबाए नज़दीक दिखा।बच्चा,मेरे सामने ही,फुर्र से उड़ने लगा, दूर जाने लगा !मानों, मुझ से कहता जा रहा हो-‘देख लो, ऐ मेरे आशिक़  मेरे चाहने वालेदेख लो, ऐ आदम की औलाद, मेरे दीवानेमैं उड़ सकता हूँअपनी राह तय कर सकता हूँअब मैं उड़ रहा हूँदूर गगन में जा रहा हूँ!’04.07.2017: शाम06:10 PM: हल्की बूंदा-बांदीघर के पीछेआंगन की दीवाल परअचानक मेरी नज़र पड़ी, एक बच्चा बैठा हुआ दिखाबुलबुल भी उसके पास मुंह में चारा दबाए हुए दिखा।बच्चा,मेरे सामने ही,फुर्र से उड़ने लगा, दूर जाने लगा !मानों, मुझ से कहता जा रहा हो-‘देख लो, ऐ मेरे आशिक़, मेरे चाहने वालेदेख लो, ऐ आदम की औलाद, मेरे दीवानेमैं उड़ सकता हूँअपनी राह तय कर सकता हूँअब मैं उड़ रहा हूँदूर गगन में जा रहा हूँ!’दूर गगन में जा……….*******************************************(3).ए कैसी, ए कैसी मोहब्बत है…?चाहते हम हैं कि हो जाए जुदाई !गम की घटा छा जाती है, जब होती है जुदाई।छा जाता है फ़िज़ा में, एक सन्नाटा-सारंज होता है बहुत, हर  जुदाई के बाद।कोई तो दर्द है, जो छुपा होता है, गहराई तक सीने मेंअश्क़ बन के छलक जाता है जो, हर जुदाई के बाद।*******************************************(4).अब वह आए न आए, अब तो न कोई मेरी चाहत हैआना हो अगर उसको, तहे दिल से मगर स्वागत् है।जब कभी वह आएगी, खिड़कियां क्या?मेरे दिल का दरवाज़ा भी खुला पाएगी;जब कभी वह आएगी, अपने घोंसले कोमौजूदा हालात में, महफूज़ जरूर पाएगी।…..मगर, वह है कि नहीं आती।मगर, वह है कि …Dated: 10.07.2017Place:  Azamgarh.।समाप्त।…र.अ. bsnl

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10 Comments

  1. babucm 10/07/2017
  2. SARVESH KUMAR MARUT 10/07/2017
  3. arun kumar jha 10/07/2017
  4. Madhu tiwari 10/07/2017
  5. raquimali 11/07/2017
  6. Shishir "Madhukar" 11/07/2017
  7. डी. के. निवातिया 11/07/2017
  8. chandramohan kisku 11/07/2017
  9. raquimali 11/07/2017

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