ज़िन्दगी जीने की कला – अनु महेश्वरी

एक पहेली ही तो है, बस जीवन अपनाकब, कहाँ, क्या, कैसे, हो जाए घटनाजिसे समझ सके, न हम कभी,वही पे विवश नज़र आते सभी,ऊपर वालें के ही हाथ है सभी की डोरइंसान फिर क्यों मचा रहा इतना शोर?

कब कौन राजा से रंक बन जाए,कब कौन जहाँ से ही चला जाए,यह नहीं इंसान के बस में जब,खुद को ज्ञानी माने कैसे है तब,क्यों फिर मन में इतना बैर तुम पालते हो,अगले पल का ठिकाना भी, नहीं जानते हो?

दुःख में क्यों ज्यादा दुखी होते हो,सुख में क्यों ज्यादा सुखी होते हो,अगर संतुलन रखना ही, सीख लेते तुम,किसी भी परिस्थिति में, न घबराते तुम,जीवन को धैर्य के साथ, फिर जी लेते तुम,ज़िन्दगी जीने की कला, सीख ही लेते तुम|

अनु महेश्वरीचेन्नई

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16 Comments

  1. Meena Bhardwaj 08/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 08/07/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 08/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 08/07/2017
  3. Shishir "Madhukar" 08/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 08/07/2017
  4. chandramohan kisku 08/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 08/07/2017
  5. arun kumar jha 08/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 08/07/2017
  6. Madhu tiwari 09/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 09/07/2017
  7. babucm 10/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 10/07/2017
    • ANU MAHESHWARI 10/07/2017

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