क्यों

क्यों ना उन पर?, मैं फ़ना हो जाऊं ?ज़ज़्बे टूटे हैं जिनके, उनमें समा क्यों ना जाऊं?गुजारिशे की जिसने नेक सी, क्यों ना मैं रहनुमां हो जाऊँ?तकल्लुफ़ कर बैठे ख़ामोश हैं क्यों?, क्यों ना मैं खुशनुमां हो जाऊँ?गर्दिशों में ज़िन्दगी थी जिनकी, क्यों ना मैं ज़ज़्बा-ए-हाल हो जाऊँ?लव से लव चिपटे थे कैसे?, क्यों ना मैं दर्द-ए-दवा हो जाऊँ?जामों में धहक रहे थे ज़्वाले, क्यों ना उनके प्यालों से छलकता जाऊँ?दीदार से आँखें घायल हुई होगी, क्यों ना मैं नज़र में आ जाऊँ?शौके ज़िन्दगी है क्यों उनकी?, क्यों ना मैं तरन्नुम होता जाऊँ?कर्ज़ से मर्ज़ ले लिया है जिसने, क्यों ना मैं इसको मिटाता जाऊँ?टूटे दिलों से ज़िन्दगी की शहर ,आबरू ख़ाक सी,क्यों ना मैं दुरुस्त होता जाऊँ?दहके हैं ज़्वाले दिलों में जिनके, क्यों ना मैं शबनम हो बरसता जाऊँ?ख़ाक-ए-ज़िन्दगी कर दी जिसने, क्यों ना मैं हम राह हो जाऊँ?किस्तियाँ डूबी हो दरिया में जिनकी,क्यों ना मैं उनको ऊपर उठाता जाऊँ?डूबे तो बोले मदद कर दो, क्यों ना मैं मज़बूत पतवार हो जाऊँ?तमन्ना में काटी हो ज़िन्दगी जिसने, क्यों ना मैं उनसे ज़ुदा हो जाऊँ?महकाने महकते रहे महक थी ऐसी, क्यों ना मैं उनके प्यालों से ज़ुदा हो जाऊँ?पी रहे इस कदर ‘मधु’ भी अब सहमा रही, क्यों ना मैं चाहतें पूरी करता जाऊँ?भुलाकर शख़्सियत, चिराग़ जलाए जश्न-ए-शाम में,क्यों ना मैं शायर-ए-ख़ास हो जाऊँ?क्या देखते वे सूनी परछाईयों में-तन्हाई काटे?, क्यों ना मैं हमदर्द हो जाऊँ?ख़ाक करने को लगा दिया, लहू अब लहू ना रहा,क्यों ना मैं नेक शरियत हो जाऊँ?फड़कती बहाँ है कलेजा भी ना थरथराया, क्यों ना मैं वज़ूद-ए-इन्सानियत ले आऊँ?उदासियाँ छायी क्यों चेहरे पर उनके?,क्यों ना मैं रौनक-ए-आफ्तव हो जाऊँ।शख्सियत अब शख्सियत ना रही; शर्मसार कर दिया जिसने,क्यों ना मैं उनमें इल्मियत ले आऊँ? सर्वेश कुमार मारुत

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