|| उदासी ||

बेटी क्या हुई विदा घर से, वीरानगी ज्यों हुई व्याप्त |बेटा परदेस गया पढ़ने, आपदा ने घर को किया आप्त || 1 ||किसी के घर में छाई उदासी, क्योकि अपनों ने मुंह मोड़ लिया |कोई दु:खी है कि जग में, मित्रों ने सम्बन्ध तोड़ दिया || 2 ||एक का घर, एकांतवास से हुआ ज्यों खुशियों से विहीन |तो दूजे के घर, कोलाहल की गर्जना से कांपती जमीन || 3 ||यह तो आम उदासी है, जिससे मानव नित होता दो-चार |वास्तविक उदासी तो वह है, जो कमर तोड़ करती लाचार || 4 ||जीवन किस पल क्या रंग दिखाए, समझ नहीं कुछ आता है |जिसे खिलाया गोद में अपनी, शमशान उसे पहुँचावाता है || 5 ||उस अभागे का करूण क्रन्दन, घर की दीवार हिलाता है |सुनने वालों का ह्रदय भी दहल जाता, जीवन नीरस बन जाता है || 6 ||कोई कर्ज के बोझ से दबा हुआ, तो किसी का गिरवी पड़ा मकान |विपत्तियों ने डाला ज्यों डेरा, स्वजनों ने भी किया परेशान || 7 ||विशेष प्रकार की होती इक उदासी, कि हम अफसर थे अब हुए रिटायर |मातहत न सलाम करेंगे अब, हम तो हुए समाज से बाहर || 8 ||जिस आफिस में आदेश हमारा, निर्बाध रूप से रहा चलता |उस कार्यालय में कुर्सी-कुर्सी भटकें, बात नहीं कोई सुनता || 9 ||जग में उदासी के प्रकार की, व्याख्या नहीं हो सकती है |किस बात से है उदास कौन, इसकी व्याख्या हो सकती है || 10 ||जीवन के बढ़ते अनुभव से, विश्लेष्ण हम कर पाते हैं |उदासी न होती उतनी बड़ी, कल्पना में हम जितना पाते हैं || 11 ||दु:ख अवसाद उदासी होते, कल्पनाओं के जन्मदाता |जितना मानव कल्पना करता, उतना तनाव है बढ़ जाता || 12 ||यह सत्य है कि घटनाएं, मन को विदीर्ण कर देती हैं |चहुँ ओर से बढ़ती उलझनें, आत्मा को विचलित कर देती हैं || 13 ||किन्तु मानव यह सोचे कि, इन सब का कारण है क्या |अनेकों घटनाओं की हो जाती, आप ही सहज व्याख्या || 14 ||जो चला गया सदा के लिए, वह लौट के फिर ना आएगा |उस हेतु होकर उदास मानव, समय व्यर्थ गवाएंगा || 15 ||यहाँ पर यदि हम यह मानें, कि जग में है एक परम शक्ति |वह सदा हमारे साथ है रहती, सहन शक्ति देती है भक्ति || 16 ||उसे ईश्वर कहो या कहो खुदा, या ‘गाड’ का उसको दो नाम |उसकी इच्छा को स्वीकार करो, दु:ख से मिल जाए विश्राम || 17 ||होनी के समक्ष नतमस्तक हो, उदासी हो जाएगी दूर |जो उसे मान्य स्वीकार करो , शांति न होगी तुमसे दूर || 18 ||यदि हम करें विश्लेषण, तो उदासी ऐसी माया है |जिसका साया सब पर पड़ता, सब पर उसकी छाया है || 19 ||समय का चक्र सबके जीवन में, उदासी अवश्य ही लाता है |यदि हम उस शक्ति को मानें, इक दिन सब ठीक हो जाता है || 20 ||जो लौट के मिलना सम्भव हो, वह लौट के फिर मिल जाएगा |जो सदा के लिए चला गया, उसे सहने का बल मिल जाएगा || 21 ||इस जगत में यदि हम खोजें, ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं |जो सब कुछ खोकर भी अपना, उसकी भक्ति को अपनाते हैं || 22 ||चक्र समय का करवट लेता, बिगड़े काम सभी बन जाते हैं |उदासी की मिटती छाया, सब मिल कर मोद मनाते हैं || 23 ||यह पथ नहीं सन्यासियों का, आम व्यक्ति भी अपना सकता |उसकी भक्ति की शक्ति से, उदासी है दूर भगा सकता || 24 ||उदासी के क्षण जब भी आएं, मन को न तनिक करो निराश |यह आती जाती बदली है, छंट जाएगी करो विश्वास || 25 ||स्रष्टि का जब से हुआ उद्भव, मानव ने उदासी झेली है |इक तुम नहीं भोगी इसके, यह सबकी अभिन्न सहेली है || 26 ||उदासी के बादल छंट के रहेंगे, मन में तुम विश्वास करो |परमशक्ति पर रखो भरोसा, उदासी से खुद को ना आप्त करो || 27 ||अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव

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8 Comments

  1. madhu tiwari 02/07/2017
  2. SARVESH KUMAR MARUT 02/07/2017
  3. डी. के. निवातिया 02/07/2017
  4. अखिलेश प्रकाश श्रीवास्तव 03/07/2017
  5. babucm 03/07/2017
  6. Kajalsoni 03/07/2017
  7. bindeshwar prasad sharma 03/07/2017
  8. Ram Gopal Sankhla 03/07/2017

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