ख़ामोशी

देखो कैसे याद दिलाती है?, उन बातों को ख़ामोशी।क्या हुआ था-क्या नहीं?, फ़िर यह कैसी मदहोशी?कुछ पूछे या कुछ बोले, तब क्या बतलाए ख़ामोशी?दुःख कैसा और कितना है?, तभी तो है यह बहोशी।लूट चुका या लूट लिया है, फ़िर कैसे बोले ख़ामोशी?दान दिया या दान लिया है, फ़िर क्यों इतनी ज़ासूसी?किसने किया और कैसे किया?, कुछ ना बोले खोमोशी।जग ऐसा यह ऐसा ही रहेगा, क्यों लीला इसकी घट-घट वासीभ्रष्ट-भ्रष्ट भ्रष्टाचार देखकर, छाई है लोगों में उदासी।हमने किया या उसने किया?, क्या बोले फ़िर ख़ामोशी?अभियान चला हड़ताल चली, तब तक थी गर्म जोशी।पर हालात ना बदल सके भाई, गुमशुम सी है ख़ामोशी।आम इंसान अब क्या कर बैठे?, बैठ चुकी सबकी ख़ामोशी।आगे क्या होगा क्या नहीं?, क्या कह सकती ख़ामोशी?जग बोले और बड़े हैं बोल, पर हम सबमें है ख़ामोशी।संसार बने संसार चले, यूँ सब लोगों में क्यों ख़ामोशी?चारों तरफ़ ख़ामोशी ही ख़ामोशी है ,कैसी है यह ख़ामोशी? सर्वेश कुमार मारुत

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12 Comments

  1. डी. के. निवातिया 01/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 02/07/2017
  2. arun kumar jha 01/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 02/07/2017
  3. ANU MAHESHWARI 01/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 02/07/2017
  4. madhu tiwari 02/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 02/07/2017
  5. Kajalsoni 03/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 04/07/2017
  6. Bindeshwar Prasad sharma 03/07/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 04/07/2017

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