फूलों की महफिल – बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा बिन्दु

 

खुशबु चमन के डालियों पर आके लग गयेजो फूल थे महकते वो गलियों में सज गये।कुछ फूल थे कुर्वानियों के सर पर चढने कोऔर जो शेष थे आके वो मैय्यत में जड़ गये।ये कहकसी है फूलों की अजीब दास्तॉये जन्नत की गुलबदन ये है गुलसितॉ।दिल लूटटे रहे और सपनों में वह गयेजो कह नहीं सके वो होठों पर रह गये।कॉटों में खूबसूरत ये कैसी नूरजहॉ हैगुलाबी बदन महकती बता तूं कहाँ है सम्मान में ये किसी के गले से यूॅ लग गयेकुछ सुरबाला के गहनों में यूॅ ही उलझ गये। बिन्देश्वर प्रसाद शर्मा  बिन्दु

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14 Comments

  1. Vivek Singh 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  2. babucm 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  3. ANU MAHESHWARI 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  4. डी. के. निवातिया 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  5. arun kumar jha 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  6. Kajalsoni 28/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017
  7. raquimali 29/06/2017
    • Bindeshwar prasad sharma 29/06/2017

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