धुँधलका यादों का

धुंधलका यादों काधुंधलका यादों का छटने लगा हैजैसे पर्दा सा कोई उठने लगा हैहैं बीती बातें जाने कितनी पुरानीपरत दर परत सब खुलने लगा हैआती हैं याद वो सावन की झाड़ियांसोंधी २ सी वो मिटटी की खुशबूलहराते हुए खुजूर के पेड़ ,और होना चाँद के रूबरूबीत गया समय जाने कब कैसेउड़ गया तितलियों के जैसेकंपकंपाती सर्दियों मेंधूप का मज़ा उठानाबागीचे में बैठ मूंगफलियां चबानाबारिश के मौसम में कश्तियाँ बहानायाद आता है अक्सर वह बचपन सुहानागर्मियों में चलना गर्म हवा काऔर रात की रानी का मंद मंद महकनाकरती थी मस्त हार श्रृंगार की खुशबूहोते ही सुबह फूलों को चुनलिखना ज़मीं पर नाम खुद काबातें हैं ये छोटी छोटी बहुतमुश्किल है मगर इनको भूलानातोड़ कच्ची अंबियाँ बागीचे से लानाऔर रसोई से नमक मिर्च भी चुरानाहै ताज़ा अब भी तस्वीर बीते दिनों कीशरारतों से भरे बीते लम्हों कीमुमकिन नहीं उन पलों में लौट जानालगता है अब था कोई सपना सुहाना

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9 Comments

  1. arun kumar jha 26/06/2017
  2. kiran kapur gulati 26/06/2017
  3. bindeshwar prasad sharma 26/06/2017
    • kiran kapur gulati 26/06/2017
  4. ANU MAHESHWARI 26/06/2017
    • kiran kapur gulati 22/07/2017
  5. Shishir "Madhukar" 26/06/2017
    • kiran kapur gulati 26/06/2017
  6. kiran kapur gulati 26/06/2017

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