मिथ्या प्रेम — डी के निवातिया

मिथ्या प्रेम

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एक बकरा पाला था राम किशन नेएक बकरा पाला था रहीम खान नेमर मिटते उनकी  जवानी देखकरकहते थे दोनों, पाला है दिल-ओ-जान से !!एक दिन हकीकत से पर्दा उठाया गयामिथ्या प्रेम था उनका, स्वार्थ भरा पाया गया  मौका था ईद और देवी पूजन का एक साथ हलाल कर, उनके हाथो, पूत सम, बकरो को खाया गया !!!ये देख रह न सका, मैं अपनी सुद्ध में खोजता रहा,  खुद ही को, मै खुद मेंवो रहबर हो गये, अल्लाह के, ईश्वर के,हम जैसे मधुप, समा गये, कीचड़ के कुमुद में !!!!!डी के निवातिया

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30 Comments

    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  1. Madhu tiwari 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  2. babucm 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  3. ANU MAHESHWARI 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  4. Meena Bhardwaj 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  5. raquimali 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  6. arun kumar jha 21/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  7. Bindeshwar Prasad sharma 22/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  8. SARVESH KUMAR MARUT 22/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  9. Anjali yadav 22/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  10. Shishir "Madhukar" 24/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  11. Shyam tiwari 26/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  12. Shyam tiwari 26/06/2017
    • डी. के. निवातिया 01/07/2017
  13. kiran kapur gulati 14/07/2017
    • डी. के. निवातिया 15/07/2017
    • डी. के. निवातिया 15/07/2017

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