आसमाँ देखता रहा…सी.एम्. शर्मा (बब्बू)..

बिखरते रिश्तों का मैं जहॉं देखता रहा…करीने से बना मकाँ देखता रहा….जिस गुल से थी चमन में खुशियां कभी…बेआबरू होते उसी को गुलिस्ताँ देखता रहा…नज़रों से शर्म सर से बुद्धि भी गयी उसके…..धरती पौधों को खाती वो समाँ देखता रहा…चुने थे रिश्ते उम्र भर के लिए कभी जो…खत्म होते कागज़ से कभी बा-ज़ुबाँ देखता रहा…सजा था ताज और गिरी बिजली सर पे कभी….वक़्त के साथ बदलता मेहरबाँ देखता रहा…ज़ाहिर करूं क्या दिए ज़ख़्म अपनों के…बदन पे अपने ‘चन्दर’ बस निशाँ देखता रहा….कौन यहाँ अपना जहॉं से क्या रिश्ता है….फिसलती रही ज़मीं मेरी,आसमाँ देखता रहा….\/सी.एम्. शर्मा (बब्बू)

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20 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  2. Shishir "Madhukar" 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  3. raquimali 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  5. Madhu tiwari 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  6. Meena Bhardwaj 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  7. डी. के. निवातिया 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  8. arun kumar jha 15/06/2017
    • babucm 16/06/2017
  9. Vivek Singh 17/06/2017
    • babucm 17/06/2017

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