बाल आग्रह – धीरेन्द्र

बच्चे हैं हम बच्चों को, बच्चे रहने दो दिल के हैं हम सच्चे तो सच्चे रहने दो गर्भ में जैसे पता लगा कि कन्या आन पड़ी है मार के सीना तान कहा, बेटो की शान बड़ी है सदियों से हैं सहती आई अब और न सहने दो बच्चे हैं हम ……हम इतने हलके फुल्के उम्मीद ना रखो भारीऐसे मत व्यव्हार करो कि दुनिया हंस्से सारीहाँ, बंधन की दीवारों को अब तो ढ़हने दो बच्चे है हम ……मन के हैं कोमल इतने, इनको कुछ भान नहीं है इनपे भी नियत डोली, और कुछ सम्मान नहीं है अरे शर्म के आंसू अब अपने कुछ तो बहने दो बच्चे है हम …..इनके भी अपने विचार, और मन में भाव भरे हैं छीना मौका, यूँ देखा कि मन ही मन में डरे हैं इनकी भी कुछ सुन लो और कुछ तो कहने दो बच्चे हैं हम बच्चों …….-धीरेन्द्र ‘प्रखर’

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6 Comments

  1. bindeshwar prasad sharma 12/06/2017
  2. Madhu tiwari 12/06/2017
  3. ANU MAHESHWARI 12/06/2017
  4. डी. के. निवातिया 12/06/2017
  5. babucm 12/06/2017
  6. Shishir "Madhukar" 13/06/2017

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