कामों का बँटवारा – शिशिर मधुकर

प्रिय मित्रो अक्सर स्त्री विमर्श की रचनाओं में मैंने पुरुष के वर्चस्ववादी समाज को एक षड्यंत्र के रूप में निरूपित होते देखा है. जबकि मेरे विचार में स्त्री के विरुद्ध अधिकतर अपराध वर्ग विभेद के कारण होते है. इसी धारणा को दृष्टिगत रखते हुए मैंने निम्न रचना लिखी हैं. इसका यह अर्थ कदापि नहीं की स्त्री जगत की समस्त समस्यों को मैं व्यर्थ मानता हूँ. स्त्री विमर्श में अन्यायों की बातें तो भरपूर हैं लेकिन अक्सर मेरे मत में वो सच्चाई से दूर हैं चूंकि समाज ने स्त्री को ज्यादा ऊँचा स्थान दिया इसीलिए लोगों ने उसको अपनी इज़्ज़त मान लिया माँ के रूप में हर बेटा सुख उसको देना चाहता है पति बने तो उसके सारे दुःख खुद लेना चाहता है भाई बने तो उसके विवाह तक रक्षा उसकी करता है बेटी के जीवन की खातिर सारे त्याग वो करता है प्रकृत दत्त गुणों के कारण कामों का बँटवारा है लेकिन सच तस्वीर दिखाना हमको नहीं गवारा है गर स्त्री पुरुष के तथाकथित भेदों को हमें मिटाना है तो समाज को तोड़ के हमको फिर जंगली बन जाना है फिर तो सब कुछ बस प्रकृत के नियमों से संचालित होगा ना ही कोई अबला होगी और ना ही कोई उत्पीड़ित होगा. शिशिर मधुकर

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12 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 11/06/2017
    • Shishir "Madhukar" 11/06/2017
  2. Meena Bhardwaj 11/06/2017
    • Shishir "Madhukar" 11/06/2017
  3. SARVESH KUMAR MARUT 12/06/2017
    • Shishir "Madhukar" 12/06/2017
  4. babucm 12/06/2017
  5. Shishir "Madhukar" 12/06/2017
    • Shishir "Madhukar" 12/06/2017
  6. डी. के. निवातिया 12/06/2017
    • Shishir "Madhukar" 12/06/2017

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