फ़टी झोली और फ़टे हाल हैं

माँग लिया हमने कुछ उनसे,झट उन्होंने मुख अपना मोड़ा।तोड़ लिए अपने दरवाजे,टक-टकी लगाए मैंने देखा ऐसे।कुछ मिल जाए-कुछ मिल जाए ,यह उम्मींद लगाए मैं बैठा।कुछ देख फिर मैंने ,अपने कदम बढ़ा लिए।फिर मैंने बस इतना सोचा,यह ज़ीवन का कटु है सच।कोई नहीं दे सकता हमको,खाने और बनाने को।और कुछ मुझे दे देते,हमारा शरीर बचाने को।पर हमें मिल सका ना कुछ,यह सोच मन बड़ा हताश है।फिर यही सोच लेता हूँ मन में,यह पिछले जन्मों का अहसास है।यही समझ कर रुक जाता हूँ,ज़ीवन अपना कंगाल है।भूख लगी और नहीं लगी है,तन कहता और नहीं कहता है।कुछ तो हमको मिल जाए,मिल जाए तो अभिनन्दन उसका।और नहीं मिला तो फिर क्या ?,हम तो वही फटी झोली हैं और फटे हाल हैं।पर मैं इस हाल को लेकर ,किस-किस के घर जाऊँ?हम तो फटी झोली हैं फटे हाल हैं,पर उनके सबके फटे हृदय हैं।और हम से भी ज़्यादा ,उन बेचारों का बुरा हाल है।पर हम फटी झोली और फटे हाल हैं,इससे भी ज़्यादा हमारा क्या बुरा हाल है ? सर्वेश कुमार मारुत

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19 Comments

  1. Madhu tiwari 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  2. ANU MAHESHWARI 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  3. Kajalsoni 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  4. bindeshwar prasad sharma 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  5. Shishir "Madhukar" 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  6. babucm 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  7. arun kumar jha 10/06/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
  8. सोनित 10/06/2017
  9. SARVESH KUMAR MARUT 11/06/2017
  10. dknivatiya 11/06/2017

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