घोंसला वो बदनाम — डी के निवातिया

घोंसला वो बदनाम

 

परिदो से भी बदतर आज का इंसान हो गया !पाए थे जहा पंख घोंसला वो बदनाम हो गया !!

रूह तरसती रही, जिस्म मालमाल हो गया ! अब तो मुहब्बत में किस्सा ये आम हो गया !!

आस टूट के बिखरी है खिजा के फूल की तरह !मातम में जश्न मनाना बेहतर काम हो गया !!

हिमायती सिपाह-सालारों पे ऐतबार क्या कीजे जब उनके ही बगल में छुरा- मुहँ में राम हो गया !!

राजधर्म पर हावी आज राजनीति इस कदर हुई है “धर्म” के नाम पर उंगली उठाना सरेआम हो गया !!

!!!डी के निवातिया

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20 Comments

    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  1. Meena Bhardwaj 09/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  2. madhu tiwari 09/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  3. ANU MAHESHWARI 09/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  4. arun kumar jha 09/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  5. Kajalsoni 10/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  6. bindeshwar prasad sharma 10/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  7. Shishir "Madhukar" 10/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  8. babucm 10/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017
  9. SARVESH KUMAR MARUT 10/06/2017
    • डी. के. निवातिया 21/06/2017

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