सुबह का फ़रमान

सुबह का जब फ़रमान आता है,कुछ कसकसाते हैं, कुछ मसमसाते हैं।कुछ उठ जाते हैं ,कुछ सिमटकर रह जाते हैं।कुछ इसका इस्तकेबाल करते हैं।कुछ तार-तार करते हैं।कुछ सूरज की तरह खिल उठते हैं।कुछ फ़ूलों की तरह मुर्झा जाते हैं।पर यह(सुबह) क्या कह इनसे?बस कह दिया अलविदा हमसे।क्योंकि इसे बहुत दूर तक जाना है।सर्वेश कुमार मारुत

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