गीत- जीवन है इक कौतुकी माया–शकुंतला तरार

“जीवन है इक कौतुकी माया”कब जागूं और कब सो जाऊंभेद कभी मन समझ न पायाजीवन है इक कौतुकी माया ||कभी रात के सन्नाटे मेंबोल लरज़ते ठहर-ठहर करकभी नदी के घाट किनारेनाविक के दर्दीले से स्वरजैसे कोई छूटा सायाजीवन है इक कौतुकी माया ||जाने क्यूँ मन होता मेरासुनती रहूँ  सुर उस नाविक केक्या मन मेरा भी उदास हैजैसे माँ हो बिन शावक केकैसे अपना मन भरमायाजीवन है इक कौतुकी माया ||क्या इसके अपने निकट नहींया ये अपनों के पास नहींमात-पिता बंधु-बांधव केसपनों का एहसास नहींक्यूँ मन में सन्नाटा छायाजीवन है इक कौतुकी माया ||शकुंतला तरार

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 05/06/2017
    • shakuntala tarar 06/06/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 05/06/2017
    • shakuntala tarar 06/06/2017
  3. डी. के. निवातिया 05/06/2017
    • shakuntala tarar 06/06/2017
  4. Kajalsoni 05/06/2017
    • shakuntala tarar 06/06/2017
  5. Ram Gopal Sankhla 06/06/2017
  6. madhu tiwari 07/06/2017

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