तपिश

तपिशये तपिशसिर्फ सूर्य की तो नहींइसमें कोई मिलावट है,यूँ लगता हैजैसे कोई घाम में आग घोल रहा है,ये थकानसिर्फ चलने की तो नहींइसमें कोई मिलावट है,यूँ लगता हैजैसे कोई पाँव में पत्थर बाँध कर चला रहा है,ये दुश्मनीसिर्फ मेरी तेरी तो नहींइसमें कोई मिलावट है,यूँ लगता हैजैसे कोई मेरे-तेरे बीच दुश्मनी करा रहा है,मेरे आँगन के पत्थरपहले भी गर्म होते थेउन पर चलने से तलुए चिलकते थे,पर अब गर्म कहाँ होते हैं जलाते हैंयूँ लगता हैजैसे कोई उनमें आग लगा रहा है,मेरे घर के झरोखे सेपहले भी गर्म हवाएं अन्दर आती थींपर, वो सुकून देती थीं,अब तो लपटें आती हैंहम डरते हैं झरोखे खोलने सेयूँ लगता है कोई झरोखे से अग्निबाण चला रहा है,कौन है वो?अरुण कान्त शुक्ला4अप्रैल, 2017

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7 Comments

  1. arun kumar jha arun kumar jha 04/06/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 04/06/2017
  3. Kajalsoni 04/06/2017
  4. SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 04/06/2017
  5. Arun Kant Shukla अरुण कान्त शुक्ला 05/06/2017
  6. C.M. Sharma babucm 05/06/2017
  7. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 05/06/2017

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