ख़ुशी – अनु महेश्वरी

मैंने ग़रीबी में भी लोगो को,मुस्कुरा, जीवन बिताते देखा है|अपनी चाहत को समेटे,मिल बाँट रहते देखा है|ज़िन्दगी को करीब से,देखा, तो जाना मैंने,खुश रहने का पैमाना,कभी नहीं होता पैसा|पैसे से, हम आराम का,सामान ही खरीद सकते,खुशियाँ, को बाजार में,कभी देखा नहीं बिकते|बाजार में बिकती,अगर जो ख़ुशी,कोई धनवान यहाँ,नहीं होते कभी दुखी|ख़ुशी, वो एहसास है,गम में भी जो हंसा दे,जीवन को महका के,ज़िन्दगी को हवा दे दे| अनु महेश्वरीचेन्नई

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18 Comments

  1. bindeshwar prasad sharma 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 31/05/2017
  2. Meena Bhardwaj 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 31/05/2017
  3. डी. के. निवातिया 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 31/05/2017
  4. MANOJ KUMAR 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 31/05/2017
  5. Kajalsoni 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 01/06/2017
  6. arun kumar jha 31/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 01/06/2017
  7. Shishir "Madhukar" 01/06/2017
    • ANU MAHESHWARI 01/06/2017
  8. raquimali 01/06/2017
    • ANU MAHESHWARI 01/06/2017
    • ANU MAHESHWARI 02/06/2017

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