मैं पवन होता

मैं पवन होता तो, नदियों आकाश-पाताल तक उड़ता।तरु के पातों को स्पर्शित कर, मैं जन-जन को हर्षित करता।पहुँच यदि तरिणी तक, तो मृदु तरंगों के सह बहता।ले थोड़ी सी ठंडाई तब, उसको लेकर मैं बढ़ता-बढ़ता।मलानतायें क्यों हैं जन में?, मैं उनको कुछ-कुछ हर लेता।तृप्त हो सके शायद मुझसे, मैं करता-मैं करता बस मैं करता।टूट चुके हैं नभचर ऐसे, प्राणों-प्राणों से ही डरता-डरता।व्याकुल विचलित हुए ये कैसे?, तब मैं इसको क्यों सहता?दबे कदम से-दबे कदम से, कहाँ चला मुझे नहीं पता?मिले कदम सागर से ऐसे, जैसे नभ बादल चलता-चलता।मिलकर चलें तब साथ-साथ, खग भी तो अब अंगड़ाता।चले-चले वे-चले-चले वे, मनों को तब ही हर्षाता।घूमा था मैं खूब गगन तक, पर चलते-चलते गया मैं थक।दूर अम्बर तक दृष्टि डालकर, डालूँ मैं डेरा जहाँ मैं रुकता।मैं था मैं अपनी लत में, नहीं दिखी थी धूल धूलता।घूमा वबंडर तब यों ऐसे, मानों आकाश धरती पर गया रखता।नींद खुली तब मैंने देखा, पर पगों में थी डगमगता।अब पड़ा हुआ पड़ा मैं धीमा, तब ही धीमा हुआ वबंडरता।विचलित लोग धूलित आँखों से, दुःख उनका मैं क्यों देख पाता?शांत हुआ कुछ शांत हुआ मैं, तब कुछ तो कुछ ही चहकाता।कुछ डर के डर- डर के मैं, भाग चला-भाग चला मैं कहाँ पता? सर्वेश कुमार मारुत

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13 Comments

  1. babucm 29/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 29/05/2017
  2. डी. के. निवातिया 29/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 29/05/2017
  3. Kajalsoni 29/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 29/05/2017
  4. Bindeshwar Prasad sharma 29/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 29/05/2017
  5. MANOJ KUMAR 30/05/2017
    • Shishir "Madhukar" 30/05/2017
      • Shishir "Madhukar" 30/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT 31/05/2017
  6. Shishir "Madhukar" 30/05/2017

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