मोर

बादल करने लगे हैं शोर,                      मेघ देख नाचे हैं मोर।जंगल में अब मची है दौड़,                     घमासान और लगी है हौड़।बिजली चमकी ताबड़ तोड़,                       अंधा- धुंधी नाचे हैं ठौर।जंगल में मंगल की हौड़,                        पैरों में पानी की पौड़।पंखों में उनके हिलकोर,                       आँखों में पानी की छौर।व्यथा कथा का है यह दौर,                        बादलों में हो उनकी डोर।जिन्हें नचाएं चारों ओर,                        तीव्र गति से नाचें हैं मोर।                        सर्वेश कुमार मारुत

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 18/05/2017
    • SARVESH KUMAR MARUT SARVESH KUMAR MARUT 18/05/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  3. C.M. Sharma babucm 19/05/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 19/05/2017
  5. MANOJ KUMAR MANOJ KUMAR 20/05/2017
  6. Meena Bhardwaj Meena Bhardwaj 22/05/2017

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