मानवता – अनु महेश्वरी

कुछ वक़्त पहले की है, बात,चल रही थी मै, फुटपाथ पे,अचानक, किसी चीज से,फिसल, गिर पड़ी मै|आस पास बहुत से लोग थे,किसी ने, ऊफ तक नहीं की,बस एक को छोड़|और मदद के लिए,जिसने हाथ बढ़ाया था,सबकी नज़रो में तो,वह खुद एक लाचार था|किसी दुर्घटना में, वह,अपने दोनों पैर गवा चूका था,और वहाँ, रोज़ शाम को,भीख मांगने बैठता है|उसने पूछा फिर भी,”तुम ठीक तो हो”,कही लगी तो नहीं”?सर न में हिला, मै,उठ खड़ी हुई जल्दी से,जिस चीज़ से, पैर फिसला था,वह एक अमरुद का छिलका था,किसी ने, खाकर, लापरवाही से,छिलके को वहीं, फेंक दिया था,गुस्सा तो आ रहा था,फिर भी मैंने, छिलके को उठा,कचरे के डिब्बे में दाल दिया|लौटते वक़्त मै सोचने लगी,जिस पे लोग दया दिखा,कुछ रूपया दे देते है,उस मे इंसानियत, अभी भी ज़िंदा है,और अपने आप को सक्षम,मानने वाले लोगो का ज़मीर,रोज़ मर्रा की आपाधापी में,कब का मर चूका है,और अब मानवता को,भूल, हम, बस ज़िन्दा है|  अनु महेश्वरीचेन्नई

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20 Comments

    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  1. कृष्ण सैनी 18/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  2. Bindeshwar Prasad sharma 18/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  3. डी. के. निवातिया 18/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  4. Shishir "Madhukar" 18/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017
  5. babucm 19/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 19/05/2017
  6. Madhu tiwari 19/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 19/05/2017
  7. raquimali 19/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 19/05/2017
  8. Meena Bhardwaj 19/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 19/05/2017
  9. MANOJ KUMAR 20/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 20/05/2017

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