उठा पत्थर, मार रहे हो किसे – अनु महेश्वरी

उठा पत्थर, मार रहे हो किसे?कभी सोचने की कोशिश भी की?या फिर अपने ज़मीर को भी,कहीं गिरवी रख दिया?याद करो वह बारिश के दिन,जब आसमाँ से सैलाब आया था,बाढ़ ने तब, प्रलय का रूप लिया था,तब इन्ही हाथों ने जान बचाई थी|तुम इतने अविनीत कैसे हो गए,जिन हाथो ने कभी मदद की थी,आज उन्ही पे प्रहार कर गए,तुम्ह इतने धृष्ट कैसे हो गए?अब तो लगने लगा, भटके हुए कोरास्ता दिखाना, फिर भी आसान है,पर, जो दिशा से, जानबूझकर भटके है,उन्हें सही मार्ग पे लाना, थोड़ा कठिन है| अनु महेश्वरीचेन्नई

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12 Comments

  1. Bindeshwar prasad sharma 17/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 17/05/2017
  2. डी. के. निवातिया 17/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 17/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 17/05/2017
  3. Shishir "Madhukar" 17/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 17/05/2017
  4. babucm 17/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 17/05/2017
  5. Meena Bhardwaj 18/05/2017
    • ANU MAHESHWARI 18/05/2017

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