७६. कभी जागीर लगती है “मनोज कुमार”

कभी शोला, कभी शबनम, कभी तू आग लगती है कभी जन्नत, परी कोई, कभी आफ़ताब लगती है कभी मेरी है तू लैला, कभी तू हीर है शीरी कभी दिल की तड़प मेरी, कभी जागीर लगती है “मनोज कुमार”

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8 Comments

  1. डी. के. निवातिया 13/05/2017
    • MANOJ KUMAR 13/05/2017
    • MANOJ KUMAR 13/05/2017
  2. bindeshwar prasad sharma 13/05/2017
    • MANOJ KUMAR 13/05/2017
  3. babucm 13/05/2017
    • MANOJ KUMAR 20/05/2017

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