दोहे – बी पी शर्मा बिन्दु

मन दरियाव में डूबा समंद मोती खोजभटका जो मन आपका वह है जीवन बोझ।मॉ बाप की सेवा जो करे सो न पछतायजो सेवा से दूर है पहले ही मर जाय।दादा दादी स्वर्ग के खुले हुये दरवारचार धाम भटक रहे यही तो अमृत धार।नैनन से जब नीर वहे बहुत गये घबरायमॉ की ऑचल छोड़ के कहीं नहीं सुख पाय।दुर्जन तो दुर्जन होत होत कभी ना पाकलोभ भला करता नहीं पाप न करता माफ।बी पी शर्मा  बिन्दु

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10 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 06/05/2017
    • bindeshwar prasad sharma 06/05/2017
  2. डी. के. निवातिया 06/05/2017
    • bindeshwar prasad sharma 06/05/2017
  3. ANU MAHESHWARI 06/05/2017
    • bindeshwar prasad sharma 06/05/2017
  4. babucm 07/05/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 08/05/2017
  5. MANOJ KUMAR 08/05/2017
    • Bindeshwar Prasad sharma 08/05/2017

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