स्वपनादेश – मनुराज वार्ष्णेय

???????????? स्वपनादेश ????????????एक था वो भी समय जब ऐसा कुछ था हो गयाहस्ती मेरी मिट गयी और कल्पना में खो गयास्थिति क्या बन गयी क्या था जो मैंने जाना थास्वप्न में कर आलिंगन प्यार को पहचाना थाएक बाला थी निराली आ गयी सपने में मेरेबोलती है क्यूँ उदास बैठे हो यूँ घर में अकेलेमाहौल था जो शांत सा आने से तेरे गर्म हो गयाक्या जगत की आलोचना से तू भी मर्म हो गयाआँखें उठा जो देखा उसको शांत स्निग्ध सा हो गयास्वप्न में था जबकि मैं एक और स्वप्न में खो गयाजाल में अपने फसाँ वशीभूत मुझको कर रही थीप्यार करके मुझको वो फिर घाव मेरे भर रही थीअफ्सरा सी लग रही थी जादूई सी उसकी छठायेंप्यार से मैं भर गया और दूर हुई काली घटाएंज़िन्दगी में मेरी कभी जो छा गयी थी उदासीरंगीन दुनिया हो गयी अब दूर हुई फिर वो उदासीभड़काकर प्रेम चिंगारी जाने किधर वो चली गयीमार्ग उसका अज्ञात था जाने कहाँ वो गली गयीकौन थी अज्ञात वो अज्ञात था उसका रास्तापल भर में उसने बदली थी मेरी पूरी दास्ताँस्वप्न ऐसा था वो मेरा मन परिवर्तित कर गयादुनिया की आलोचना से दूर वो अब कर गयादूर करो गोपन व्यथाएं छोड़ दो ये पीड़ा शेषप्यार भर लो ज़िन्दगी में ऐसा था मेरा ” स्वपनादेश “

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8 Comments

  1. kiran kapur gulati kiran kapur gulati 26/04/2017
  2. C.M. Sharma babucm 26/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 26/04/2017

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