मन

मन —–मनुष्य का मन सही में बहुत ही नटखट होती है अब यहाँ है तो क्या होगा ?पलभर में बहुत दूर जा सकती है। चैत की गर्म धूप लू के जैसी उड़ती रहती है चारों ओर जैसे पगला गयी है। पेड़ की ऊँची डाली पर बैठी उस पंक्षी के जैसी हर्ष के साथ उड़ती रहती इस डाल से उस डाल और नापना चाहती है नीला आसमान। मनुष्य का मन बहुत चंचल होती है और चंचल मन बिन मांझी की नाव जैसी जो सही में बीच समुन्द्र में दुब जाएगी। मन तो चंचल होती है और ये भुलाकर ले जाती है अपनी डगर पर और सत्य की डगर से भटका देती है। पलभर में तुम्हारी तोड़ देगी अट्टालिका असानी से। धन- दौलत भरे राजा से पथ की भिखारी बना देगी। यदि जीवन की डगर मसृन बनाना चाहते हो तो उस पगले मन को गुलाम बनाना होगा। तभी तुम जीवन की एक-एक पग सुनहरी अक्षर से लिख पाओगी। —–चंद्र मोहन किस्कू

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6 Comments

  1. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 25/04/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 25/04/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 25/04/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/04/2017
  5. C.M. Sharma babucm 26/04/2017

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