कविता:- किसान मर रहा, अमन नैन

किसान मर रहा हैलकिर अपनी मिटा रहाफूटी किस्मत कोआँसूओ से सिच रहादर्द अपने कोदिल मे सहला रहाकरके दिन रात एककर्ज अपना चूका रहापीना से पेट भरकरअपना गुजारा कर रहासपने परिवार केरेत मे रूला रहामिट्टी मे मिट्टी होकरसोना उगाह रहाउसी सोने को बाजार मेकोडी के भाव बेच रहाराज नेता खेल रहे खेलमौत का तमाशा उसका देख रहेअमन कलम अपनी सेलिख हाल किसान कादुनिया मे उजागर कर

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9 Comments

  1. Madhu tiwari 25/04/2017
    • Aman Nain 30/04/2017
  2. Shishir "Madhukar" 25/04/2017
    • Aman Nain 30/04/2017
  3. babucm 25/04/2017
    • Aman Nain 30/04/2017
    • Aman Nain 30/04/2017
  4. Bindeshwar prasad sharma 30/04/2017

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