धूप छाँव (डॉ.विवेक कुमार)

धूप छाँवहै आज मुझमें सामर्थ्य खड़ा हूँ पैरों पर अपने इसलिए तुम रोज ही आते हो मेरे घर मेरा हालचाल पूछने।बाँधते हो तारीफों के पुल आज बात-बात पर।किंतु मैं अपने अतीत को अब तक नहीं भुला पाया हूँ।गर्दिश के उन दिनों में तुम दूज के चाँद बन बैठे थे घर पर रहने के बाद भी’नहीं है घर में कहलवा देते थे कैसे भूलूँ उन क्षणों को मित्र,जब तुम मुझे देख कर भी अनदेखा कर देते थे,यह सोच कर कि,शायद मैं तुमसे कुछ माँग ना बैठूँ।

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7 Comments

  1. kiran kapur gulati 25/04/2017
  2. Madhu tiwari 25/04/2017
  3. ANU MAHESHWARI 25/04/2017
  4. babucm 25/04/2017
  5. Shishir "Madhukar" 25/04/2017
  6. Kajalsoni 27/04/2017

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