जिस्म मिटटी है…सी. एम्. शर्मा (बब्बू)…

जिस्म मिटटी है सुना बहुत मैंने…पहले यकीं न था पर अब…यकीं होने लगा है….जिस्म मिटटी है…हर कोई आता है नश्तर ले के…खोदता है अच्छी तरह से…गढ्ढा बनाता है और…अपने मतलब का पौधा लगा जाता है…माली की तरह अनुशासित हो…हवा…पानी भी ज़रुरत मुताबिक़…समय समय पे आ देता है…पौधे कुछ तो बहुत ही कंटीले हैं…हलकी सी हवा चलने पे भी…बहुत चुभते हैं…कभी कभी खूँ निकाल देते हैं…और ज़मीं लाल कर देते हैं….और फिर उस लाली से…मिटटी उपजाऊ होती जाती है…नए पौधे निकलते आते हैं…..जिस्म मिटटी ही तो है….\/सी. एम्. शर्मा (बब्बू)

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20 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  2. Shishir "Madhukar" 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  3. mani 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  4. डॉ. विवेक 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  5. Meena Bhardwaj 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  6. Madhu tiwari 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  7. डी. के. निवातिया 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
  8. Kajalsoni 12/04/2017
    • babucm 12/04/2017
    • babucm 13/04/2017
  9. kiran kapur gulati 13/04/2017
    • babucm 12/04/2017

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