सँवरना आता है – अजय कुमार मल्लाह

फ़र्क पड़ता नहीं कदमों पर मेरे समझाने का,इन्हें तो बस तेरी गली से गुज़रना आता है।है तुझे अपना ख़याल मगर मेरी परवाह नहीं,मेरी हर बात पर तुझको तो मुकरना आता है।तन्हा होकर हार गया हूँ इन्हें समेटते-समेटते, इन यादों के मोतियों को बस बिखरना आता है।कितनी मगरूर हो गयी तु तासीर-ए-हुस्न में, आज कल तुझे तो सिर्फ सँवरना आता है।

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16 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 10/04/2017
  2. डी. के. निवातिया 10/04/2017
  3. babucm 10/04/2017
  4. ANU MAHESHWARI 10/04/2017
  5. Kajalsoni 10/04/2017
  6. Meena Bhardwaj 10/04/2017
  7. Madhu tiwari 10/04/2017
  8. mani 12/04/2017

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