अकेली थी आयी धरा पर…

अकेली थी आयी धरा पर, मैं अकेली ही रहूंगी; थिरकती गुनगुनाती समा मेंएक मौन पहेली ही रहूँगी परिवर्तन का झोंका बेहता सदा से, बहकाता हर मन को यह अपनी अदा से, अस्थिरता से उनकीमैं डरूंगी;अकेली थी आयी धरा परआलिंगन में खरबों विकार भरें है, समीप सौहार्द ओढ़े मेरे बेरूपी खड़े हैं, प्रतिश्रव से उनके मैं प्रभावित होउंगी;अकेली थी आयी धरा पर, मैं अकेली ही रहूंगी; थिरकती गुनगुनाती समा मेंएक मौन पहेली ही रहूँगी निहारिका मोहन

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8 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 10/04/2017
  2. mani mani 10/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 10/04/2017
  4. Kajalsoni 10/04/2017
  5. डॉ. विवेक डॉ. विवेक 10/04/2017
  6. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2017
  7. Niharika Mohan 10/04/2017
  8. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/04/2017

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