आज की वास्तविकता…

कदम पहला ही रखते देखा मैंने,कुछ लोग, एक मुर्दे को ले जा रहे थे;पर हैरानी की बात है, एक भाईसाहबबेपरवाह हो मुस्कुरा रहे थे !
अस्पताल की नीरवता मेंउसका हँसना,अत्यंत हृदय-भेदी थाआभास हुआ- आधुनिकता के कारणवह,भावावेग-रहित रोगी था ।
दृश्य वह विचारों मेंरह-रहकर आ नृत्य करता है,प्राणी निस्सार है यह बताविश्वास को मेरे झकझोर देता है ।
संसार की मंजुल शक्लफरेबी प्रतीत हो जाती हैउसका हँसना आज जायज़ हैयह समझा,मुझे भीतर ही भीतर घाव पहुँचाती है ।
                                                                      –    निहारिका मोहन

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6 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 10/04/2017
  2. mani mani 10/04/2017
  3. Kajalsoni 10/04/2017
  4. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 10/04/2017
  5. Niharika Mohan 10/04/2017
  6. Madhu tiwari Madhu tiwari 10/04/2017

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