भीतर तू निहारा कर

अपनी अपनी जिद से पल भर को किनारा कर मुमकिन है कि बन जाये फिर से बात दोबारा कर मुझको कोई चीज़ समझ न तेरा हूँ तो तेरा ही हूँतुझसे दूर नही जाऊंगा कितना भी इशारा कर एक समंदर गहरा दिल है सारे गम पी जायेगागम की सारी नदियों को मेरी और पुकारा करधूप नही जो आंगन में तो सूरज को मत कोसा करजुगनू को मनमीत बना दिल में कुछ उजियारा करसारी फसलें काट चुका जो मिट्टी से मिल आया हैवो जो घर का बूढा है मत उस पर ज्ञान बघारा करमाँ जो कहती है “तू” बेटा, सूरज चंदा तारा हैबातें उसकी झूठी न हो खुद को एक सितारा करकुछ न हासिल हो,’विनीत’ तू खुद को पा जायेगाबाहर से पहले, ग़र अपने भीतर तू निहारा कर – देवेंद्र प्रताप वर्मा”विनीत”

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7 Comments

  1. kiran kapur gulati 09/04/2017
  2. babucm 09/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" 09/04/2017
  4. ANU MAHESHWARI 09/04/2017
  5. Madhu tiwari 09/04/2017
  6. davendra87 09/04/2017
  7. Kajalsoni 09/04/2017

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