हे सखी !

हे सखी ! मैं तुम्हें क्या दूँ ?वैसे तुम उस कृष्ण सी परिपूर्णा तो नहीं ,जो तुम्हें कुछ देने आया दाता स्वयं ही सकुचा जाये ,ना ही मैं उस सुदामा सा दीन ,जो चाह कर भी खुद से तुम्हारे लिये कुछ ला ना सकूँ ,यह तोहफ़े ,यह उपहार ,चाहूँ तो भेंट कर सकता हुँ मैं तुम्हें ,हो सकता हैं शायद तुम इन्हें पाकर प्रसन्न भी हो जाओ ,गहन रात्रि के काले गगन से तुम्हारे इन चक्षुओं में ,चमकती दामिनी सी चमक फूट पड़े ,किन्तु सखी ! मैं यह ला ना सका ,ऐसा नहीं है कि मैंने प्रयास ही ना किया हो ,लेने तो निकला था मैं तुम्हारे लिये कुछ ,पर मध्य पथ में ही कही थम गया ,सोचा कोई सुन्दर सा उपहार तो मैं तुम्हारे लिये ले आऊँगा ,पर उस भौतिक वस्तु में तुम्हारे कोमल हृदय सा ,वो भाव कहाँ से लाऊँगा !तो हे सखी! मैं तुम्हें क्या दूँ ?सोचता हुँ यह चाँद तारे तुम्हें ला दूँ ,यह प्रियजन ,कवि ,शायर ,यह सब अक्सर ही बटाँते फिरते हैं इन्हें ,इनकी तरह आसमाँ से चाँद -तारे लाने का साहसतो मुझमें नहीं ,पर कोई झूठा चाँद ,कुछ टूटे सितारेतो मैं भी देने चला था तुम्हें ,किन्तु हे सखी ! मैं क्या करूँ ,कोई झूठा चाँद ,कुछ टूटे सितारे तो मैंले आता ,पर उनमें तुम्हारे दृढ़ विश्वास सी ,वो स्थिरता कैसे भर पाता !फिर हे सखी ! मैं तुम्हें क्या दूँ ?मन किया तुम्हें भगिनी पुकार कर ,तुम्हारे साथ अटूट संबंध स्थपित कर लूँ ,शायद इससे तुम्हारे मुख पर ,अचरज से भरी , स्वछंद मुस्कान भी आ जाती ,किन्तु हे सखी ! मैं तुम्हें भगिनी भी ना कह सका ,मन इस बात से विचलित हो उठा कितुम तो भगिनी का साथ सदैव के लिये बड़ी कुशलतासे निभा जाओगी ,पर जो जीवन भर तुम्हारी रक्षा करने मे समर्थ हो ,मैं अपनी कलाई में क्या वो शक्ति ला पाउँगा ?हे सखी ! मैं तुम्हें क्या दूँ ?विचार आया तुम्हें द्रोपदी की उपमा प्रदान कर ,हमारी मित्रता को ,कृष्णा -द्रोपदी समान ,मित्रता की पराकाष्ठा पर घोषित कर दूँ ,किन्तु हे सखी ! मैं इतना भी न कर सका ,जानता था , तुम निर्मला , द्रोपदी सा वोदायित्व भार उठा लोगी ,पर मैं ! आवकश्यता पड़ने पर ,सारे संसार सेलड़कर , कृष्ण सा वो साथ कहाँ दे पाऊँगा !सुनो सखी ! मैं तुम्हें क्या दूँ ?यह तोहफे ,यह उपहार ,सुगंधित पुष्पों के यह हार ,यह मनमोहक सुन्दर संसार ,मैं इनमे से कुछनहीं दे पाउँगा !ना ही यह चाँद तारे ,अलौकिक पदार्थ सारे ,मैं इन्हें ना ला पाउँगा !हे सखी ! मैं तो तुम्हें भगिनी भी ना पुकार पाऊँगा ,ना ही मैं तुम्हें कोई उपमा देकर ,किसी अनंत इतिहासका कोई हिस्सा बना पाउँगा !सखी ! मैं तो इतना भी ना जानता कि ,क्या तुम्हारे लियेकभी कुछ भी कर पाऊँगा !शायद इसीलिये अभी भी यही कह रहा हुँ ,मैं तुम्हें क्या दूँ ?हे सखी ! मैं तुम्हें क्या दूँ ? -प्रान्जल जोशी।

Оформить и получить экспресс займ на карту без отказа на любые нужды в день обращения. Взять потребительский кредит онлайн на выгодных условиях в в банке. Получить кредит наличными по паспорту, без справок и поручителей

4 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/04/2017
    • Pranjal Joshi 09/04/2017
  2. Kajalsoni 09/04/2017
    • Pranjal Joshi 09/04/2017

Leave a Reply