अलबेला हूँ — डी के निवातिया

अलबेला हूँ

!

भीड़ में खड़ा हूँ, फिर भी अकेला हूँ कदाचित इसीलिए मै अलबेला हूँ !!शोरगुल में धँसा पड़ा हूँ आफतो में फँसा पड़ा हूँरोता सा मै हँसा खड़ा हूँजनसमूह ने  धकेला हूँ, फिर भी मै अलबेला हूँ !!!गैरो के लिये तो मैला हूँ अपनों के लिये छैला हूँ दुखियो के सदा गैला हूँ कोई कहे आदतन हठेला हूँ, पर जैसा भी हूँ अलबेला हूँ !!!दिखावे का विरोधी हूँ जागरूकता का रोधी हूँ जमाना कहे अवरोधी हूँ आलोचनाएं झेला हूँ ,कारणवश मै अलबेला हूँ !! !साधारण सा कर्म योगी हूँस्वस्थ होकर भी रोगी  हूँ विषाक्त समाज में भोगी हूँ जीता नहीं पर खेला हूँ, क्योकि मै सबसे अलबेला हूँ !!!मन मस्त मलंग मै रहता हूँहर दुःख दर्द हँसके सहता हूँ निसंकोच दिल की कहता हूँदुनिया की नजर में वेला हूँ, समझता खुद को अलबेला हूँ !!!हमेशा सबकी सुनता हूँ अपनी कब कह पाता हूँ खुद ही में खोया रहता हूँ सबकी नजर में पागलो का चेला हूँ, सम्भवत अलबेला हूँ !!!भीड़ में खड़ा हूँ, फिर भी अकेला हूँ, कदाचित मै अलबेला हूँ !संशय में हूँ पर जिंदगी को ठेला हूँ , यक़ीनन मै अलबेला हूँ !!

!!!डी के निवातिया

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22 Comments

  1. Shishir "Madhukar" 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  2. ANU MAHESHWARI 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  3. Meena Bhardwaj 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  4. Kajalsoni 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  5. Madhu tiwari 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  6. babucm 12/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  7. kiran kapur gulati 13/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  8. mani 15/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017
  9. ashwin1827 16/04/2017
    • डी. के. निवातिया 17/04/2017

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