जर-जर नाव

जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती हैमुझे सहारा देने तिनका ढूँढ़ती है दया की भीख माँगती हुईलहरों के चरण चूमती हैभंवर में फँसी जिन्दगी संगतड़पती, बिखलती घूमती है जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती हैशिथिल काया में अपनी स्मृति ढूँढ़ती है गर्म रेत में बिखरे आँसून जाने क्यूँकर ढूँढ़ती हैऔर कणों को छूकर हरपलखुद के आँसू से झुलसती है जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती हैबीते क्षणों की मरीचिकायें ढूँढ़ती है सुनामी को यादकर अब भीडरती हुई डगमगाती हैअपने आँसुओं की कहानीखुद के जिगर को सुनाती है जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती हैभटकती जिन्दगी में खुद को ढूँढती है गरीब झोपड़ियों के अंदरसिसकती साँस टटोलती हैसब कुछ खोया बिखरा पाकरबेबस हो स्वयं बिखलती है जर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती हैमृत्यु के अथाह ढेर में मुझे ढूँढ़ती है मुखोंटों की भीड़ में घुसकरमेरा चेहरा ढूँढ़ती हैसड़क पर पड़ी लाश देखकरभीड़ चीर आगे बढ़ती है मेरी अंतिम श्वास भी यहीं ढूँढ़ती हैजर-जर नाव बिचारी किनारा ढूँढ़ती है। …  भूपेन्द्र कुमार दवे00000

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4 Comments

  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 07/04/2017
  2. Kajalsoni 07/04/2017
  3. C.M. Sharma babucm 07/04/2017
  4. Madhu tiwari Madhu tiwari 08/04/2017

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