दर्द जुदाई का – अजय कुमार मल्लाह

महफ़िल महफ़िल यही शोर है,तेरी ज़िन्दगी में कोई और है।ये दीवानगी है कि आवारगी है,भटकता मुसाफ़िर नहीं ठौर है।पलकें झुकाकर रो कर, रूला कर,छोड़ गयी तु मुझे लब-ए-ग़ौर है।कसम याद रखना या वादे निभाना, हुई ये बातें पुरानी नया दौर है।तुम बिन जिया ना मरा जाए हमसे,फँस गयी ज़िन्दगानी किसी भौर है।

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16 Comments

  1. डी. के. निवातिया 06/04/2017
  2. babucm 06/04/2017
  3. डॉ. विवेक 06/04/2017
  4. Meena Bhardwaj 06/04/2017
  5. ANU MAHESHWARI 06/04/2017
  6. Kajalsoni 07/04/2017
  7. Shishir "Madhukar" 07/04/2017
      • mani 08/04/2017

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