मोहब्बत की शायरी – अजय कुमार मल्लाह

(1)उसके लबों की ख़ामोशियाँ कुछ बता रहीं थीं,जब वो छोड़कर मुझे तन्हा कहीं जा रही थी,मैं ही पागलों की तरह ये दिल्लगी कर रहा था,मत करो मुझसे इतनी मोहब्बत वो तो समझा रही थी। (2)तुझे पाने के बाद मैं खोना नहीं चाहता था,सारी ज़िंदगी तेरी याद में रोना नहीं चाहता था,पर ये सब कुछ तो खुद-ब-खुद हो गया,मै कभी भी तुझसे जुदा होना नहीं चाहता था। (3)अब आप ही बताइए मेरे इस सवाल का जवाब,कि क्यूं नहीं पूरे हुए मेरे देखे सारे ख़्वाब,रहकर उसकी याद साथ मुझे कब तक तड़पाएगी,वो कहकर भी तो नहीं गयी कि लौटकर कब तक आएगी।

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17 Comments

  1. डी. के. निवातिया 04/04/2017
  2. ANU MAHESHWARI 04/04/2017
  3. Shishir "Madhukar" 04/04/2017
  4. mani 04/04/2017
  5. babucm 04/04/2017
  6. Madhu tiwari 05/04/2017
  7. Meena Bhardwaj 05/04/2017
  8. Kajalsoni 05/04/2017
  9. Ajay kumar 29/08/2019

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