मैं जल रही, तड़प रही, एक आग दिल में भड़क रही!

मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!उम्मीद सपने खो दिए,निराशा में हम रो दिए;सिन्दूर दूसरे का पहनमेरी कोई पहचान नहीं!मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!मुझपर कभी जो एसिड फेंका,मैंने उसे भी मौन झेलातेरे भेंट किये ज़ख्मों कोमैं प्रदर्शित करती नहीं…मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!अययाशी रगों में तेरे,फिर भी तुम संसार मेरे;मुझे पर्दे में हो रखतेमैं शिकायत करती नहीं!मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!बंधन में रखते हो तुम,सुरक्षा का ढोंग करते हो तुम,पर मेरी इज़्ज़त से तुम्ही खेलतेये मैं सह सकती नहीं!मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!मैंने तेरा परिवार बसायातुझे पशु से इंसान बनाया;जो बाज़ार में मेरा धंधा करो तुम,तुझे जीवित छोडूंगी नहीं!मैं जल रही, तड़प रहीएक आग दिल में भड़क रही!- निहारिका मोहन

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3 Comments

  1. C.M. Sharma babucm 01/04/2017
  2. Niharika Mohan 01/04/2017
  3. Kajalsoni 02/04/2017

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