दर्द की दवा न मिली मुझे किसी बैद और हकीम के पास ………सांसे धिमी चलती है पर फिर भी है मुझे जिने की आस।रातो मे तारो को गिनता हूँ बैठ कर अंधेरे के पास……….अमावस्या के दिन भी करता हूँ चाँद के पुरे होने की आस।पानी नही मिलता पिने के लिए आँसुओ से बुझानि पडती है प्यास।चल रहा हूँ सालो से पर करता रहता हूँ अपनी ही तलाश ।किसी ने गिराया ईस शहर-ए-जालिम मे  तो किसी ने संभाला……..हजारो शख्स आजमा लिए पर रूह को सुकून मिला सिर्फ माँ-बाप के पास।   (गुरू देव सिह)

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6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 28/03/2017
    • Guru dev singh Guru dev singh 28/03/2017
  2. Kajalsoni 29/03/2017
    • Guru dev singh Guru dev singh 29/03/2017
  3. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 29/03/2017
    • Guru dev singh Guru dev singh 29/03/2017

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