काहें , भूल गयले रे भाई !

काहें भूल गयले रे भाई !अब आपन नया साल के मनाई !काहें भूल गयले रे भाई !जीवन के सौम्य – श्रृंगार केप्रकृति के बसंत-बहार केभारत के भव्य सत्कार केअन्याय के सुंदर प्रतिकार के लोग भूला गयलें अभीये,नित मंगल – गान के गाई…अब आपन नया साल के मनाई…देशवा देखलस घोर निराशा ,कतना कट गयले, विकट तमाशा;लाखन के बडी भयल हताशा,अब याद कर हो, इहे हमार अभिलाषा ! बीतल दुःख-दर्द , रक्त-संहार के,आज नईखे कवनो दुहाई…काहें भूल गयले रे भाई…अब आपन नया साल के मनाई..नव जीवन के नव संचार केप्राणियों में सुखद् व्यवहार केनित-नित गा-ल, सत्य पुकार के;शुभ मुहुर्त्त बा, दूर कर कष्ट , विकार के |वीरन् के धरती के आशा,अब के के लगाई…काहें भूल गयले रे भाई…अब आपन नया साल के मनाई…काहें भूल गयले रे भाई…!© कवि आलोक पाण्डेयजय हिन्द !

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5 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 26/03/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 26/03/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/03/2017
  4. C.M. Sharma babucm 26/03/2017
  5. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 27/03/2017

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