मंगल नववर्ष मनाएँगे

गाँव-गाँव में शहर-शहर में,कैसी छायी उजियाली है;खेतों में अब नव अंकुर , नव बूंद सेछायेगी हरियाली है |बहुत कुहासा बीत चुकाअंतर्मन का ठिठोर मिटा,नवचेतन में नवबहार-बसंत,प्रकृति का सुंदर अभिलेखा |नवजागृत , नुतन, नव-स्नेह का,कैसी दीखती परिभाषा है;हर प्राणी के जीवन का चेतन,नैसर्गिक अभिलाषा है |नव स्फूर्त्ति आयी विकट शोक से ,धन्य है जीवन भारत – ‘आलोक’ से ,संतप्त जीव अब हैं सुरभित ;प्रकृति भी पुष्पित – पल्लवित |सब छोड चलें प्रकृति की ओरविकृत अखंड भारत के स्वीकृति की ओर ,यदि दीखे जहाँ जहरीला धुंध काला,लाना होगा ‘ युद्धरत-हो’ उजाला |शस्य – श्यामला पुण्य – धरा की,यशगाथा , को गाएँगे |अहा ! चैत्र-शुक्ल , प्रतिपदा तिथि ,मंगल नववर्ष मनाएँगे |©कवि आलोक पाण्डेयवाराणसी, भारतभूमि

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6 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 26/03/2017
  2. ANU MAHESHWARI ANU MAHESHWARI 26/03/2017
  3. Kajalsoni 26/03/2017
  4. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/03/2017
  5. C.M. Sharma babucm 26/03/2017
  6. आलोक पाण्डेय आलोक पान्डेय 26/03/2017

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