मानव सब मेरे ही अपने

मानवजग में जितने हैंसब मेरे ही अपने हैं;सोच भले हो अलग-अलग सबके अपने काम-काज़ हैंसबके अपने सपने हैं।काफिर या मुनाफिक किसी को क्यों कह दूं मैं,ये बात भला कैसे कह दूं मैं -उनमें कोई जान नहीं है;मुस्लिम की अब क्या गारंटी कोई जब उसकी पहचान नहीं हैजब उसमें इख़लाक़ नहीं है जब उसका पक्का ईमान नहीं है !कौन है काफिर मैं कैसे पहचानूंहै कौन मुनाफिक कैसे मैं जानूं;एक मुस्लिम के आमाल का क्या है लेवल इसका मुझको ज्ञान नहीं हैमुझको इसका इल्हाम नहीं है।गैर कहूँ तो किसको कह दूं मैं, सब हैं बंदे, सब हैं ख़िलक़त, एक परवरदिगार की;सभी जीती-जागती निशानियां हैंबाबा आदम-माई हव्वा के प्यार की।…..Raquim Ali, bsnl

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5 Comments

  1. Madhu tiwari Madhu tiwari 25/03/2017
  2. raquimali Raquim Ali 25/03/2017
    • raquimali raquimali 27/03/2017
  3. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 26/03/2017
  4. C.M. Sharma babucm 26/03/2017

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