गुजरे लम्हे – शिशिर मधुकर

मेरे नगमों को वो पढ़ते हैं तो घबरा से जाते हैंगुजरे लम्हे कई लफ्जों में पा शरमा से जाते हैंसम्भल के सोचते है जब उमंगे मन में उठती हैंउल्फ़त के हसी एहसास सब तड़पा से जाते हैंखुद पर गुमा करते हैं देख कर मेरी हालत कोकरके रश्क़ अपने मुकद्दर पे भरमा से जाते हैतमन्नाएं लाख जगती हैं मगर डर है ज़माने काबहकर यूँ ही बेकार फिर सब अरमा से जाते हैमिले ना मुद्दतों से उनके दिल का हाल ऐसा हैआम बातों पर भी मधुकर वो गरमा से जाते हैंशिशिर मधुकर

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14 Comments

  1. ANU MAHESHWARI 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  2. babucm 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  3. डी. के. निवातिया 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  4. Meena Bhardwaj 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  5. Madhu tiwari 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017
  6. Kajalsoni 25/03/2017
    • Shishir "Madhukar" 25/03/2017

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