ग़ज़ल

हैं नहीं आग कलमों में पुरानी सी यारों | बात दिखती नहीं कोई सयानी सी यारों ||तेग बन क्यों नहीं चलती क़लम काग़ज़ों पर |कह न पाये क़लम दिल की कहानी सी यारों ||खून लिखती मुनाफा देख कर हादसों के |है लगी बहने मतलब की रवानी सी यारों ||दर्द कहती नहीं मासूम का ये किसी से | देख कर छा गयी हो बेजुबानी सी यारों ||हाल बेहाल सा दिखने लगा हर लफ्ज़ का |बात होने लगी जब से ज़ुबानी सी यारों ||खो रही है क़लम हस्ती “मनी” आज अपनी |देखना हो न जाये ये बेगानी सी यारों ||मनिंदर सिंह “मनी”२१२ २१२२ २१२ २१२२

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14 Comments

    • mani mani 22/03/2017
  1. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 21/03/2017
    • mani mani 22/03/2017
  2. Shishir "Madhukar" Shishir "Madhukar" 21/03/2017
    • mani mani 22/03/2017
  3. KaviKrishiv KaviKrishiv 21/03/2017
    • mani mani 22/03/2017
  4. C.M. Sharma babucm 21/03/2017
    • mani mani 22/03/2017
  5. ALKA ALKA 22/03/2017
    • mani mani 22/03/2017
  6. Kajalsoni 22/03/2017
    • mani mani 22/03/2017

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